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ताहा शब्बीर फक्कड़

किसी भी व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता और सम्मान का अधिकार ही मानव अधिकार है। मनुष्य योनि में जन्म लेने के साथ मिलने वाला प्रत्येक अधिकार मानवाधिकार की श्रेणी में आता है। संविधान में बनाये गए अधिकारों से बढ़कर महत्व मानवाधिकारों का माना जा सकता है। इसका कारण यह है कि ये ऐसे अधिकार हैं जो सीधे प्रकृति से सम्बन्ध रखते हैं जैसे जीने का अधिकार केवल कानून सम्मत अधिकार नहीं है बल्कि इसे प्रकृति से प्रदान किया गया है। सभी व्यक्तियों को गरिमा और अधिकारों के मामले में जन्मजात स्वतंत्रता और समानता प्राप्त है। वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे जीवन स्तर को प्राप्त करने का अधिकार है जो उसे और उसके परिवार के स्वास्थ्य, कल्याण और विकास के लिए आवश्यक है। मानव अधिकारों में आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों के समक्ष समानता का अधिकार एवं शिक्षा का अधिकार आदि नागरिक और राजनैतिक अधिकार भी सम्मिलित हैं।

अशोक के आदेश पत्र आदि अनेकों प्राचीन दस्तावेजों एवं विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक पुस्तकों में अनेक ऐसी अवधारणाएं हैं जिन्हें मानवाधिकार के रूप में चिह्नित किया जा सकता है। आधुनिक मानवाधिकार कानून और इसकी अधिकांश अपेक्षाकृत व्यवस्थाओं का सम्बन्ध समसामयिक इतिहास से है। ‘ द ट्वेल्व आर्टिकल्स ऑफ़ द ब्लैक फारेस्ट (1525) को यूरोप में मानवाधिकारों का प्रथम दस्तावेज माना जाता है जो कि जर्मनी के किसानों की स्वाबियन संघ के समक्ष उठायी गयी मांगों का ही एक हिस्सा है। यूनाइटेड किंगडम में 1628 ई0 पेटिशन ऑफ़ राइट्स में मानवीय अधिकारों का उल्लेख किया गया तथा वर्ष 1690 ई0 में जॉन लॉक ने भी इन अधिकारों का अपनी पुस्तक ” स्टेट्स ऑफ़ नेचर ” में वर्णन किया। वर्ष 1791 ई0 में ब्रिटिश बिल ऑफ़ राइट्स ने यूनाइटेड किंगडम में सिलसिलेवार तरीके से सरकारी दमनकारी कार्यवाहियों को अवैध ठहराया। वर्ष 1776 ई0 में संयुक्त राज्य अमेरिका की स्वतंत्रता के बाद इन अधिकारों को अमेरिकी संविधान में स्थान दिया गया। वर्ष 1789 ई0 में फ्रांस क्रांति के उपरांत फ्रांस में भी मानव तथा नागरिकों के अधिकारों की घोषणा को अभिग्रहित किया गया।

संपूर्ण विश्व में मानवाधिकारों का महत्व को ध्यान में रखते हुए, संयुक्त राष्ट्र चार्टर में यह स्पष्ट कथन किया गया था कि लोग यह विश्वास करते हैं कि मानव गरिमा और स्त्री-पुरुष के सामान अधिकार आदि कुछ ऐसे मानवाधिकार हैं जो कभी छीने नहीं जा सकते हैं। इस घोषणा के परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ ने 10 दिसंबर 1948 को मानव अधिकार की सार्वभौमिक घोषणा अंगीकार की। इस घोषणा में न सिर्फ मनुष्य जाति के अधिकारों को स्थान दिया गया बल्कि स्त्री-पुरुषों को भी सामान अधिकार दिए गए। इस घोषणा से सभी राष्ट्रों को प्रेरणा और मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। जिससे वे इन अधिकारों को अपने संविधान या अधिनियमों के द्वारा मान्यता देने और क्रियान्वित करने की दिशा में अग्रसर हुए। मानव अधिकारों को पहचान देने और इन अधिकारों के अस्तित्व के लिए किये जाने वाले संघर्ष को सशक्त करने के उद्देश्य से प्रत्येक 10 दिसंबर को अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने इस दिन को मानवाधिकारों की रक्षा और उसे बढ़ावा देने के लिए तय किया। मानवता के खिलाफ होने वाले अत्याचार को रोकने और उसके विरुद्ध संघर्ष को नया आयाम देने में मानवाधिकार दिवस की महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत में 28 सितम्बर 1993 से मानवाधिकार कानून लागू किया गया और 12 अक्टूबर 1993 में सरकार ने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन किया। भारत के संविधान में भी मानव अधिकारों को पर्याप्त मान्यता देते हुए मानवाधिकारों की अन्तर्राष्ट्रीय घोषणा पत्र को प्रत्याभूत किया गया है और राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अन्तर्गत लोक कल्याणकारी राज्य के निर्माण के दृष्टिकोण से तथा मौलिक अधिकारों के रूप में प्रतिष्ठापूर्ण और गरिमामयी माहौल में जीवन जीने के अधिकार प्रदान करने की गारंटी दी गयी है।

मानव अधिकारों एवं मूल अधिकारों के मध्य शरीर और आत्मा का सम्बन्ध है। भारतीय संविधान में न सिर्फ मानवाधिकारों की गारंटी दी गयी है बल्कि इसका उल्लंघन करने पर सजा का भी प्रावधान किया गया है। भारतीय संविधान का उद्देश्य एक ऐसे समाज की स्थापना था जो विधि संगत होने के साथ ही मानव हित में भी हो। जिसके अंतर्गत समस्त देशवासियों को बिना किसी भेदभाव के समान अवसर, शांति, और सुरक्षा के वातावरण में गरिमामयी रूप से जीने का अधिकार मिल सके।

भारतीय संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों में धर्म की स्वतंत्रता अंतर्भुक्त है। ये अधिकार भारतीय न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय हैं। भारतीय न्यायालयों द्वारा मानवाधिकारों की सक्रीय रूप से रक्षा करने की बात भी स्वीकार की गयी है। इस प्रकार अनेकों न्यायिक दृष्टान्त भी जीवन की स्वतंत्रता, समता, गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार आदि मौलिक अधिकारों एवं मानव अधिकारों के प्रतिबिंबित उदाहरण हैं। वास्तव में मानवीय जीवन और अधिकारों की रक्षा किसी देश के मानवाधिकार कानूनों के लिए गौरवान्वित करने वाली बात है। वर्तमान में हमारे देश में मानवाधिकारों की स्थिति वास्तव में जटिलता में देखी जा रही है। मानवाधिकारों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसका हनन राजनैतिक कारणों के अतिरिक्त धार्मिक मुद्दों पर भी किया जा रहा है। प्रत्येक जाति वर्ग को पारस्परिक सहिष्णुता की भावना के साथ प्रेम और स्नेह के मार्ग पर चलने का सन्देश देने के नाम पर कट्टरता का प्रचार करते हुए हिंसा का बढ़ावा दिया जा रह है। भले ही मानवाधिकारों का चिंतन करने के नाम पर आतंकवाद और नक्सलवाद इसके सबसे बड़े शत्रु दिखाई पड़ते हैं किन्तु वास्तव में इसका दूसरा पक्ष अशिक्षा के रूप में भी समाज के समक्ष परिलक्षित होता है। यही कारण है की आम लोग शिक्षा का अभाव होने से मानवाधिकारों के हनन किये जाने पर उसका विरोध भी नहीं कर पाते हैं।

भारत के विशाल आकार और विविधता, संप्रभुता संपन्न, धर्म निरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणतन्त्र के रूप में इसकी प्रतिष्ठा तथा भूतपूर्व औपनिवेशिक राष्ट्र के रूप में इसके इतिहास के परिणामस्वरूप इसकी स्थिति जटिल हो गयी है। यद्दपि भारत में दक्षिण एशिया के अन्य देशों की भांति आमतौर पर मानवाधिकारों को लेकर चिंता का विषय नहीं माना जाता है। मानवाधिकारों के उल्लंघन के दृष्टिकोण से पुलिस हिरासत में यातना व्यापक रूप से परिलक्षित होती है। आज भी पुलिस की जवाबदेही का मुद्दा एक गंभीर प्रश्न बना हुआ है। हालाँकि वर्ष 2006 में मा० उच्चतम न्यायालय ने प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ के मामले में अपने एक फैसले में केंद्र और राज्य सरकारों को पुलिस विभाग में सुधार की प्रक्रिया प्रारम्भ करने के सात निर्देश दिए है। अगर भारत में मानवाधिकारों की बात की जाये तो यह प्रायः यह प्रतीत होता है की यहाँ आज भी एक खास तबके के लोगों को ही हैसियत के अनुसार मानवाधिकार मिल पाते हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान आदि राज्यों में जहाँ साक्षरता का स्तर थोड़ा काम है वहां मानवाधिकारों का हनन आम बात है। इन राज्यों के पिछड़े और अशिक्षित क्षेत्रों में प्रायः बेक़सूर और गरीब लोगों पर पुलिस और प्रशासन द्वारा अमानवीय तरीके से कानूनी कार्यवाही करने अथवा अन्य तरीके से शोषण किये जाने की घटनाएँ चर्चा में बनी रहती हैं लेकिन इसके विपरीत जिन शहरों में लोग साक्षर हैं वहां इसका गलत इस्तेमाल भी करते हैं।

मानवाधिकार एक ऐसा विषय है जो सभी सामाजिक विषयों में सबसे गंभीर है। जिस पर हम एक पक्षीय विचार नहीं कर सकते हैं किन्तु अपने राजनीतिक या स्वार्थपरक अथवा अन्य दुर्भावनापूर्ण उद्द्येश्यों की पूर्ति हेतु मानवाधिकारों का सहारा लेना बिलकुल गलत है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि क्या किसी ऐसे हत्यारे या आतंकवादी का कोई मानवाधिकार हो सकता है जो हजारों मासूमों की जिंदगी तबाह करने का दोषी हो और अगर ऐसे आतंकवादी का मानवाधिकार है तो क्या उन लोगों के मानवाधिकारों का कोई अस्तित्व है जो इन असामाजिक तत्वों का शिकार बनते हैं। जहाँ तक आतंकवादियों और अपराधियों के मानवाधिकारों की बात है तो उचित नहीं लगता है किन्तु जब इन्हीँ अपराधियों के साये में कोई निर्दोष फंस जाता है या किसी घटना की वास्तविकता का पता लगाने के लिए गैरकानूनी या अमानवीय रूप से किसी निर्दोष को शारीरिक या मानसिक यातना दी जाती है तो स्वतः ही मानवाधिकारों के महत्व और आवश्यकता का अहसास होता है।

आज पूरे विश्व में ताकत और पैसे के बल पर होने वाली हिंसा इस बात का प्रत्यक्ष सबूत है कि मानवता खतरे में है। हालात ऐसे हैं कि यदि मानव पर कोई सामाजिक और विधिक नियंत्रण न हो तो वह खुद की श्रेष्ठता साबित करने के लिए मरने मारने को तैयार नज़र आएगा। वास्तव में आज दुनिया में संपन्न और शक्तिशाली लोगों के बीच यदि आम जनता सुरक्षित ढंग से रह पा रही है तो उसका एकमात्र कारण सबको मिलने वाला तथाकथित मानवाधिकार है। यूँ तो मानवाधिकार सबके लिए समान है किन्तु इसका वास्तविक लाभ उसे ही मिल पता है जिसके पास पर्याप्त जानकारी, सामर्थ्य अथवा संसाधन उपलब्ध हैं।

प्रकृति के अलावा मनुष्यों द्वारा बनाये गए विधि सम्मत कानून का भी यह कर्त्तव्य है कि वह मानवाधिकारों की रक्षा करें। हमारे मानव समाज में मानवाधिकारों के प्रति सचेतता आम लोगों में विशेष रूप से दिखाई नहीं पड़ती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमारे देश में आये दिन घटित होने वाली महिलाओं के शारीरिक और मानसिक शोषण और प्रताड़ना की घटनाएँ, प्रतिदिन होने वाली हजारों भ्रूण हत्याएं भारतीय संस्कृति की गरिमा तार-तार करती हैं। भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा, शारीरिक प्रताड़ना और मानसिक उत्पीड़न आदि अत्याचारों से पीड़ित महिलाओं के विषय में मानवाधिकारों की आवश्यकता को रेखांकित करते ही हमारा समाज प्रायः मौन हो जाता है। ऐसे ही सैकड़ो वर्षों से वनों अथवा उसके आस-पास के क्षेत्रों में निवास करने वाले आदिवासी और वनवासी समाज के परंपरागत अधिकारों और मानव अधिकारों की समुचित रूप से पहचान तक नहीं की जा सकी है तथा उन्हें आज तक चकबंदी, सीलिंग, पट्टे भू-अभिलेख या भूमि आवंटन का पर्याप्त लाभ नहीं मिल सका है।

वास्तव में मानव समाज में मौजूद समस्याओं का निराकरण करना ही मानवाधिकार की संकल्पना का लक्ष्य है। सूखा, बाढ़, गरीबी, अकाल, सुनामी, भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं और युद्ध एवं दुर्घटनाओं आदि से पीड़ित व्यक्तियों को राहत और पुनर्वास के मानवाधिकारों का ध्यान रखा जाना अपेक्षित है। जिससे लोगों की वाक्-अभिव्यक्ति और धार्मिक स्वतंत्रता एवं भय तथा अभाव मुक्त एक ऐसी विश्व व्यवस्था की उस स्थापना की जनसाधारण की सर्वोच्च आकांक्षा पूर्ण हो सके क्योंकि सम्पूर्ण मानव समाज के सभी सदस्यों के जन्मजात गौरव और समान अविच्छिन्न अधिकार की स्वीकृति ही विश्व शांति, न्याय और स्वतंत्रता की बुनियाद है। यद्दपि किसी भी प्रकार के अन्याय और अत्याचार तथा अत्याचार के विरुद्ध हिंसक विद्रोह से मानव समाज को बचाने के लिए कानून द्वारा नियम बनाकर मानव अधिकारों की रक्षा करना श्रेष्ठ उपाय सिद्ध हो सकता है किन्तु मानव अधिकारों सम्बन्धी घोषणाओं के वास्तविक क्रियान्वयन की आवश्यकता है। जिससे मानव अधिकार सम्बन्धी घोषणा-पत्र सिर्फ दस्तावेज बनकर न रह जाएँ। वास्तव में इसी में मानवाधिकारों की सार्थकता निहित है। यद्दपि हमारे देश की सरकार मानवाधिकारों के प्रति सजग है किन्तु इस सजगता में और अधिक धार लाने की आवश्यकता है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मानवाधिकार और उसकी रक्षा प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य बनकर सार्वभौमिक सत्यता का सूत्रपात कर रहा है। समसामयिक दृष्टिकोण से मानवाधिकारों का सम्मान गंभीर चिंतन का विषय बना हुआ है। परस्पर सदभाव द्वारा ही हम मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अपनी ओर से गारंटी दे सकते हैं।


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