दिल्ली विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन पर केंद्रीय गृह मंत्री ने रखे अपने विचार – अतुल सचदेवा सीनियर जर्नलिस्ट


नई दिल्ली, 19 मई। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि विश्वविद्यालयों को हिंसा और वैचारिक लड़ाई का अखाड़ा नहीं होना चाहिए। संघर्ष की जगह विमर्श को स्थान मिलना चाहिए। अमित शाह दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित 3 दिवसीय संगोष्ठी के उद्घाटन समारोह के दौराना मुख्यातिथि के तौर पर संबोधित कर रहे थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग द्वारा ‘स्वराज’ से ‘नव-भारत’ तक विचारों का पुनरावलोकन विषय पर इस तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन शताब्दी समारोह के हिस्से के रूप में किया जा रहा है। संगोष्ठी के उद्घाटन अवसर पर केंद्रीय शिक्षा एवं कौशल विकास और उद्यमिता मंत्री धर्मेंद्र प्रधान विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे जबकि समारोह की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने की।


समारोह के दौरान अपने संबोधन में अमित शाह ने कहा कि आइडियोलॉजी के लिए लड़ने की जरूरत नहीं होती बल्कि विचार और विमर्श से ही आइडियोलॉजी आगे बढ़ती है और युगों-युगों तक चलती है। उन्होने हुए कहा कि नालंदा और तक्षशिला को तोड़ने वालों को कोई याद नहीं करता। उन्होने अधिकारों की लड़ाई को लेकर युवाओं से आह्वान किया कि चाहे थोड़ा अधिकार मिले लेकिन अपने दायित्वों की चिंता करें। जब अपने दायित्वों की चिंता करेंगे तो किसी के अधिकारों की रक्षा स्वयं हो जाएगी। उन्होने युवाओं से आह्वान किया कि वे संघर्ष का रास्ता छोड़ कर दायित्वों का रास्ता अपनाएं।
उन्होने समाज में परिवर्तन के लिए विश्वविद्यालयों के महत्व को बताते हुए कहा कि जब भी परिवर्तन होते हैं तो उनके वाहक विश्वविद्यालय होते हैं। युग परिवर्तन में विश्वविद्यालयों का विशेष महत्व रहा है। उन्होने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलनों से लेकर उसके बाद भी अनेकों आंदोलनों के वाहक हमारे विश्वविद्यालय रहे हैं और अब ये विचारों के आंदोलन के वाहक बन सकते हैं। उन्होने दिल्ली विश्वविद्यालय के संदर्भ में कहा कि यह विश्वविद्यालय 100 साल बाद भी अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखे है जो बड़ी बात है। इसके लिए उन्होने डीयू के पहले कुलपति हरी सिंह गौड़ से लेकर वर्तमान कुलपति प्रो. योगेश सिंह सहित सभी को बधाई दी। उन्होने कहा कि इस देश में 2014 के बाद जो नजरिए को बदलने की शुरुआत हुई है उसका वाहक भी दिल्ली विश्वविद्यालय बने। उन्होने डीयू की स्थापना से लेकर अनेकों महानुभूतियों को याद किया जिनका जुड़ाव डीयू से रहा है।1975 में देश के लोकतन्त्र को बचाने का जो आंदोलन हुआ उसमें भी दिल्ली विश्वविद्यालय का बहुत बड़ा योगदान रहा।


मुख्यातिथि ने संगोष्ठी के थीम को लेकर कहा कि यहा बहुत महत्वपूर्ण विषय है। इस संगोष्ठी में अनेकों विचारों पर चर्चा होगी। उन्होने संगोष्ठी के शीर्षक में स्वराज शब्द की व्याख्या को लेकर कहा कि आजादी के बाद शासन करने वालों ने इसकी परिभाषा को केवल शासन व्यवस्था तक सीमित कर दिया जबकि इस शब्द का अर्थ बहुत व्यापक है। उन्होने कहा कि स्वराज की कल्पना में स्व शब्द का बहुत महत्व है। स्व की व्याख्या में ही स्वदेशी, सत्य, अहिंसा, स्वधर्म और राष्ट्रवाद आदि समाहित हैं। तत्कालीन शासकों ने सभी व्यवस्थाओं को सीमित करके केवल शासन तक ही समेट दिया है। उन्होने कहा कि स्वराज की कल्पना में ही न्यू इंडिया का विचार समाहित है।
उन्होने कहा कि भारत को भू-राजनैतिक देश के रूप में देखना ठीक नहीं है, यह एक भू-सांस्कृतिक देश है। भारत के कोने कोने में सांस्कृतिक एकता है और यह संस्कृति ही हमें जोड़ती है। उन्होने कहा कि विश्व में जो अच्छा हो रहा है उसे स्वीकारना हमारी विशेषता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हमारा जो पुराना था वह प्रासंगिक नहीं है। हमने हजारों वर्ष पहले विश्व बंधुत्व की बात कही है। उन्होने कहा कि भारत पर वर्षों से पड़ौसी देशों द्वारा हमले होते रहे हैं, लेकिन जब भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक करके मुंह तोड़ जवाब दिया तो विश्व के सामने भारत की रक्षा नीति स्पष्ट हुई। उन्होने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में पिछले 8 वर्षों में भारत को सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से समृद्ध बनाने का प्रयास हुआ है।सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से भारत में बहुत काम हुआ है। पहले जो 80 करोड़ लोग खुद को देश की व्यवस्था का हिस्सा ही नहीं मानते थे, अब अंतोदय से वो भारत की अर्थव्यवस्था का हिस्सा मानने लगे हैं। लाभार्थियों को डीबीटी के माध्यम से बिना बिचौलियों के सीधे खातों में पैसे पहुँच रहे हैं। कोरोना के दौरान 190 करोड़ टीके वैक्सीन लगा कर विश्व में मिसाल कायम की है। आज भारत दुनिया की प्रतिस्पर्धा में आगे है। उन्होने कहा कि विकास समाज के एक वर्ग के लिए नहीं बल्कि सम्पूर्ण समाज के लिए हो रहा है। उन्होने नरेंद्र मोदी के मजबूत नेतृत्व में उत्तर पूर्व के 75% हिस्से से अफसपा को हटाने की चर्चा करते हुए कहा कि कभी लोग कहा करते थे कि धारा 370 हटाने से खून की नदियां बह जाएंगी जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुटकी बजकर उसे हटा दिया और किसी के कंकड़ चलाने की भी हिम्मत नहीं हुई।
गृह मंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भविष्य के भारत का उज्ज्वल दस्तावेज़ है। इसके तहत हर प्रकार के ज्ञान को प्लेटफार्म देने का प्रयास किया गया है। उन्होने कहा कि यह पहली शिक्षा नीति है जिसका कोई विरोध नहीं कर पाया। उन्होने नई शिक्षा नीति के तहत शुरुआती 5 वर्ष तक की शिक्षा को मातृभाषा में देने की नीति को भविष्य के लिए लाभप्रद बताया। शाह ने कहा कि जो बच्चा मातृ भाषा से कट जाता है वह अपने मूल से कट जाता है। देश की शिक्षा व्यवस्था में कोई भी भाषा सीखें लेकिन अपनी मातृ भाषा पढे बिना देश की मूल धारा के प्रति नहीं जुड़ पाएंगे। उन्होने बताया कि नई शिक्षा नीति के तहत कक्षा 6 से 8 तक वोकेशनल शिक्षा को महत्व दिया गया है। पुरानी शिक्षा नीति में बच्चे 11वीं कक्षा से आगे के लिए स्ट्रीम चुनते थे जबकि अब 9वीं कक्षा से ही आगामी शिक्षा के लिए स्ट्रीम का चुनाव कर सकेंगे। उन्होने मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई अनेकों स्कीमों का वर्णन करते हुए कहा कि इस देश को महान इस देश का युवा ही बना सकता है। अपने संबोधन के अंत में गृह मंत्री ने कहा कि इस तीन दिवसीय संगोष्ठी में विचारों से जो अमृत निकलेगा वो निसंदेह देश के काम आएगा।
समारोह के विशिष्ट अतिथि केंद्रीय शिक्षा और कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के कार्यान्वयन में नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह शिक्षा नीति ‘नवभारत’ को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के लिए एक रोड मैप पर चर्चा करते हुए इस बात पर जोर दिया कि विश्वविद्यालय को भविष्य में पेटेंट प्रक्रियाओं, ग्रीन जीडीपी अकाउंटिंग, ई-कॉमर्स आदि अल्पकालिक पाठ्यक्रम शुरू करने का लक्ष्य रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत ने कोविड महामारी के दौरान स्वयं को लचीली अर्थव्यवस्था बनाया। उन्होने कहा कि भारत सरकार द्वारा वर्तमान समय में किए गए अच्छे कार्यों को वैश्विक स्तर पर पहुँचाने में विश्वविद्यालय की भूमिका होनी चाहिए।
संगोष्ठी के उद्घाटन समारोह के दौरान अपने स्वागत भाषण में डीयू कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह का डीयू परिसर में आना विश्वविद्यालय के इतिहास में एक स्वर्णिम दिन है। इसके साथ ही उन्होने केंद्रीय शिक्षा एवं कौशल विकास और उद्यमिता मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का भी स्वागत किया। कुलपति ने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2047 तक भारत को 6 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के सपने को साकार करने में विश्वविद्यालय की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि अगले 20 वर्षों में कम से कम 10% की वृद्धि दर होगी। उन्होंने कहा कि विश्वविद्याल्यों में ही इस तरह के विचार तैयार होते हैं और उन्हें लागू किया जाता है। विचारों की भूमिका पर जोर देते हुए उन्होंने बताया कि दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने शताब्दी वर्ष में उन विद्यार्थियों को अपनी लंबित डिग्री पूरी करने का मौका दिया है जो किन्हीं कारणों से उस समय में अपनी डिग्री पूरी नहीं कर पाए थे। उन्होने बताया कि इसके लिए परीक्षा में बैठने हेतु पंजीकरण एक पखवाड़े के लिए खुला था और इसमें 1560 विद्यार्थियों ने अपना पंजीकरण कराया, जिनमें से सबसे पुराना विद्यार्थी बी.कॉम का 1977-1980 बैच का एआरएसडी कॉलेज से है। उन्होंने कहा कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी के ‘नए भारत’ के सपने को साकार करने के लिए इस तरह के लीक से हटकर विचार आवश्यक हैं।
इस अवसर पर अपने विशेष व्याख्यान में भारतीय शिक्षण मंडल के राष्ट्रीय संगठन सचिव मुकुल कानितकर ने कहा कि भारत सिर्फ आध्यात्मिक ही नहीं बल्कि आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सभी क्षेत्रों में जाना जाता है। हम स्वराज से आत्मनिर्भर भारत में स्थानांतरित हो गए हैं और सही समय पर तकनीक का उपयोग भारत को शक्ति के शिखर पर ले जाएगा। शक्ति का यह मॉडल दुनिया को पारिवारिक तौर पर प्यार से रहना सिखाएगा। उन्होने कहा कि आज की अस्तित्वगत समस्या का समाधान रिपेयर, रीयुज और रिसाइकिल है और विश्वविद्यालय हरित जीवन के लिए मॉडल बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि ये ‘नव भारत’ के कुछ नए घटक होंगे।
संगोष्ठी के उद्घाटन समारोह के दौरान मुख्यातिथि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अलावा विशिष्ट अतिथि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान, डीयू कुलपति प्रो. योगेश सिंह, भारतीय शिक्षण मंडल के राष्ट्रीय संगठन सचिव मुकुल कानितकर, डीन ऑफ कलेजज बलराम पाणी, डीयू के साउथ दिल्ली परिसर के निदेशक प्रो. श्री प्रकाश सिंह, सीओएल की निदेशक प्रो. पायल मागो, डीयू कुलसचिव डॉ विकास गुप्ता, राजनीतिक विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. संगीत रागी, शताब्दी समारोह समिति की कनवीनर प्रो. नीरा अग्निमित्रा, टीचर्स ट्रेनिंग यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. धनंजय जोशी, डीयू पीआरओ अनूप लाठर आदि सहित अनेकों गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।
ये दस्तावेज़ हुए रिलीज
सेमिनार के उद्घाटन सत्र के दौरान संगोष्ठी की सार संक्षेप पुस्तिका के साथ ही डीयू के अपडेट एक्ट का भी विमोचन किया गया। इस अवसर पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 पर आधारित स्नातक पाठ्यक्रम 2022 की रूप रेखा के गुजराती, उड़िया, बंगाली और उर्दू भाषा में अनुवादित संस्करण का विमोचन किया गया।

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