डॉक्टरों को जहां भगवान माना जाता है वही देखिए क्या क्या है सुविधाएं
कालनेमियों के हांथ में जिला चिकित्सालय, पैसों के लालच में रक्षक बने हैं भक्षक।


जिला सरकारी अस्पताल में पैसे दो और इलाज लो,

मनोज वर्मा/धर्मेश शुक्ल

लखीमपुर खीरी (संज्ञान न्यूज़)। जिन चिकित्सकों को लोग अपना भगवान मानकर उनके पास जाते हैं लेकिन सच्चाई कुछ और ही है चिकित्सालय चाहे सरकारी हो या प्राइवेट
(1) मरीज के परिजनों से की जाती है धन उगाही, आपका मरीज अगर बेहद सीरियस है इमरजेंसी का मामला है तो अस्पताल में उनके गुर्गे घूम रहे हैं जिनको कुछ रुपए दे कर के आप डॉक्टर से मिल सकते हैं,
(1 A) जो भी मेडिसिन अस्पताल में है वह ब्लैक करके पड़ोस के मेडिकल स्टोरों पर बिक्री कर दी जाती है फिर वही दवा प्राइवेट में मरीजों के लिए पर्ची लिखकर के बाहर से मंगाई जाती है और यह बोला जाता है जल्दी ले आइए वरना आपके मरीज की जान को खतरा है।


(2) अगर आप वीआईपी हैं तो आपके लिए सारे ट्रीटमेंट और दवाइयां अस्पताल में ही उपलब्ध हो जाती, अगर आप बीआईपी हैं और आपका मरीज ज्यादा सीरियस है तो लखनऊ मेडिकल कालेज तक ले जाने के लिए फ्री में सरकारी एंबुलेंस उपलब्ध है, लेकिन आम आदमी के लिए तीन से ₹5000 खर्च करके ले जाना पड़ता है, डोनर और खून दोनों बाहर से ही लाना पड़ता है,
(3) जनरल वार्ड में वार्ड बॉय को 50 से ₹100 प्रतिदिन दीजिए तो आपका वह चार बार ख्याल रखेगा और ट्रीटमेंट करने आएगा, अगर आप यह नहीं कर पाए तो आप के मरीज की दुर्दशा कर देते हैं एक ही भी को 4 दिन तक लगा रहेगा मरीज की पट्टी जानवरों की तरह निकालते हैं और कुछ कहने पर ऊपर से वार्ड बॉय या नर्स धमकाते भी है।
(3) चिकित्सालय परिसर में जो भी डॉक्टर हैं उनकी सैलरी अगर आप जान जाए तो आपके पैरों के तले से जमीन खिसक जाएगी लेकिन व वार्ड में 24 घंटे में केवल दो बार ही मरीजों को देखने आते हैं।


(4) अस्पताल परिसर में मरीजों के अभिभावकों को रोकने के लिए किसी भी प्रकार की सुलभ वह सक्षम व्यवस्था नहीं है, कभी फागिंग भी नहीं कराई जाती मच्छरों के लिए मरीज तो मरीज मरीज के साथ में आने वाले परिजनों का भी हाल यह मच्छर मरीजों की ही तरह कर देते।



(5) चिकित्सालय में बने शौचालयों की दुर्दशा देखी नहीं जाती बाहर सुलभ शौचालय बने हुए हैं जहां पांच से ₹10 चुकाकर के मरीजों के परिजन को निवृत होना पड़ता है, चिकित्सालय परिसर में गंदगी का अंबार लगा रहता है चारों तरफ नालियां खुली पड़ी रहती हैं और शौचालय गंदगी से भरे पड़े रहते हैं।


(5 A) नीचे से लेकर ऊपर तक हर अधिकारी अपने निचले तके के अधिकारी से धन उगाही करता है, इस दौर में कालनेमि का रूप धारण कर यह डॉक्टर मरीजों की दशा के लिए नहीं बल्कि अपनी ड्यूटी पूरी करने के लिए आते हैं और चले जाते हैं किसी भी मरीज से कोई मुरव्वत नहीं, आप के मरीज को अगर गंभीर बीमारियां हैं और आप अगर बाहर की दवा नहीं ला सकते हैं तो आपके मरीज की जान जानी ही जानी है।


(5 B) अगर आप वार्ड बॉय से मिलकर के उसको कमीशन खिलाते हैं तो सारी जांच आपकी भीतर ही हो जाएगी वरना आप की जांच डॉक्टर बाहर से लिख देगा या हवाला देते हुए कि परिसर की सभी मशीनें खराब पड़ी हुई हैं अगर आपके पास कोई जोर है कोई नेता नगरी है तो आपका सारा काम चिकित्सालय में ही हो जाएगा, अगर आपको इस गंदगी की शिकायत जिला अधिकारी से करते हैं तो वह नगरपालिका पर छोड़ देता है ।

और अगर नगरपालिका से कहते हैं तो फोर्थ क्लास के सफाई कर्मियों पर टाल देते हैं, यह चिकित्सक कालनेमि का रूप ले कर के हमारे आपके बीच में हैं जो कि मन में राम बगल में छुरी उनका कार्य कर रहे हैं, जबकि जनता इनको भगवान मानती है।


,, यही कुछ हल प्राइवेट सेक्टर के हॉस्पिटलों का है जहां आपका मरीज भले ही अच्छा खासा हो थोड़ी बहुत उसको बीमारी हो लेकिन ले जाने वाले दलालों से सारी जानकारी आपके बारे में पूछ कर फिर आपको परेशान करने तथा धन उगाही का खेल खेला जाता है, आप के मरीज को कुछ इस तरीके से दवाइयां दी जाती है कि उसकी हालत और खराब हो जाए फिर परिजनों को डरा करके शुरू होता है ।

खेल और यह प्राइवेट हॉस्पिटल मैं मरीज को कमीशन पर भेज देते हैं जिससे अधिक धन उगाही कर सकें और डॉक्टरों को कमीशन प्राप्त हो सके क्योंकि इनको भगवान से भी डर नहीं लगता मरीजों के पास धन रहने तक मरीज के वारिसों का ही किया ही करते हैं जब तक मरीज की सारी प्रॉपर्टी बेचकर जिला चिकित्सा पुरुष के के पास ना पहुंच जाए आप को निचोड़ कर रख देते हैं।

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