प्रो.मैनेजर पाण्डेय को मिर्ज़ा ग़ालिब के प्राध्यापक ने दी श्रद्धांजलि

संवाददाता रज़ा सिद्दीक़ी
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गया (संज्ञान दृष्टि) हिन्दी के जाने माने आलोचक डॉ. मैनेजर पाण्डेय का रविवार को निधन हो गया.इस अवसर पर मिर्ज़ा ग़ालिब कॉलेज के प्राध्या पकों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी.हिन्दी के अध्यापक डॉ. इबरार खान ने कहा कि
मैनेजर पांडेय का जन्म 23 सितम्बर, 1941 को बिहार प्रान्त के गोपालगंज जनपद के गाँव ‘लोहटी’ में हुआ.उनकी आरम्भिक शिक्षा गाँव में तथा उच्च शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हुई, जहाँ से उन्होंने एम.ए. और पीएच. डी. की उपाधियाँ प्राप्त कीं.आजीविका के लिए अध्यापन का मार्ग चुनने वाले मैनेजर पाण्डेय जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भाषा संस्थान के भारतीय भाषा केन्द्र में हिन्दी के आचार्य रहे.वे जेएनयू में भारतीय भाषा केन्द्र के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। इसके पूर्व पाण्डेय जी बरेली कॉलेज, बरेली और जोधपुर विश्वविद्यालय में भी प्राध्यापक रहे।वहीं मैनेजर पाण्डेय से पढ़ चुकी प्रोफेसर डॉ. नुसरत जबीं सिद्दीकी ने बताया कि
डॉ० मैनेजर पांडेय कहा करते थे विचारधारा के बिना आलोचना और साहित्य दिशाहीन होता है. आलोचना में पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग ईमानदारी से होना चाहिए क्योंकि पारिभाषिक शब्द विचार की लम्बी प्रक्रिया से उपजते हैं.साहित्य की सामाजिकता की खोज और सार्थकता की पहचान करना ही आलोचना की सबसे बड़ी चुनौती है.हिन्दी के लेखक और मिर्ज़ा ग़ालिब कॉलेज के अध्यापक डॉ. जियाउर रहमान जाफरी ने उनके बारे में बताया कि मैनेजर पाण्डेय की साहित्यिक समीक्षा जगत में अपनी एक अलग पहचान थी. समकालीन साहित्य के साथ भक्तिकाल और रीतिकाल के साहित्य पर पाण्डेय जी ने सर्वथा नवीन दृष्टि से विचार किया हैै और नवीन स्थापनाएँ दीं हैं. जिस रीतिकाल को राग और रंग का साहित्य कहा जाता है वहाँ भी वह समकालीन चेतना के बीज तलाश लेते हैं.रीतिकाल के प्रमुख कवि पद्माकर की कविता में अंग्रेजी साम्राज्यवाद के प्रति जनचेतना को रेखांकित करनेे का सामर्थ्य मैनेजर पाण्डेय को ही था.अंग्रेजी विभाग की प्रोफेसर डॉ.सरवत शमसी ने कहा कि
पाण्डेय जी गत साढे़ तीन दशकों से हिन्दी आचोलना में सक्रिय थे.उर्दू विभाग के अबु हुज़ैफ़ा ने उनकी किताबों शब्द और कर्म तथा बिहारी का नया मूल्यांकन की चर्चा की.

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